सृष्टि के
प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रrाजी ने मनुष्य योनि की रचना की, परंतु वह अपने सृजन से संतुष्ट नहीं थे। तब ब्रrाजी ने विष्णु जी से आज्ञा लेकर अपने कमंडल
से जल को पृथ्वी पर छिड़क दिया, जिससे पृथ्वी पर कंपन होने लगा और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुभरुजी
सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिनके एक हाथ
में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। वहीं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं
माला थी। जब इस देवी ने वीणा का मधुर नाद किया तो संसार के समस्त जीव-जंतुओं को
वाणी प्राप्त हो गई, तब ब्रrाजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती
कहा।
सरस्वती को
वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। संगीत की उत्पत्ति
करने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं।
वसंत पंचमी के
दिन को माता सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।
पुराणों के
अनुसार भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार के रूप में सरस्वती से खुश होकर उन्हें
वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी आराधना की जाएगी।
इस कारण हिंदू
धर्म में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational
story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है:facingverity@gmail.com.पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और
फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!
Source – KalpatruExpress News Papper
|
OnlineEducationalSite.Com
Vasant Panchami लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Vasant Panchami लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014
बसंत पंचमी को लेकर प्रचलित कथा
बसंत पंचमी क्यों है महत्त्वपूर्ण
प्रत्येक वर्ष
माघ माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। देवी
सरस्वती के इस प्राकट्य पर्व को सर्वसिद्धिदायक पर्व माना जाता है। माघ माह में
जब सूर्य देवता उत्तरायण रहते हैं तो गुप्त नवरात्रि के मध्य पंचमी तिथि को लोक
प्रसिद्ध स्वयंसिद्ध मुहूर्त के रूप में माना जाता है।
वागीश्वरी
जयंती और श्रीपंचमी शास्त्रों के अनुसार यह दिन प्रत्येक शुभ कार्य के लिए
अतिश्रेष्ठ माना जाता है। प्रकृति के चितेरों, साहित्य मनीषियों और कवियों ने इस दिन को अपनेअ पने तरीके से परिभाषित किया
है। यह विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना का दिन है। इस तिथि
को वागीश्वरी जयंती और श्रीपंचमी नाम से भी जाना जाता है।
शास्त्रों में
कहा गया है कि यदि यौवन हमारे जीवन का बसंत है तो बसंत इस सृष्टि का यौवन है।
गीता में भी कहा गया है कि बसंत ऋतु के रूप में भगवान कृष्ण प्रत्यक्ष रूप से
प्रकट होते हैं।
ज्योतिषि कर्म
फलदायी यह दिन ज्योतिषिप्रेमियों के लिए भी बेहद शुभ होता है। इस दिन किए गए
कार्य का फल कई गनुा मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टि से पांचवीं राशि के अधिष्ठाता
भगवान सूर्य नारायण होते हैं इसलिए बसंत पंचमी अज्ञान का नाश करके प्रकाश की ओर
ले जाती है। अबूझ मुहूर्त होने से इस दिन शादी-विवाह के लिए मुहूर्त की आवश्यकता
नहीं होती। इसलिए इस दिन को लोककल्याणकारी माना गया है।
देवी सरस्वती
का प्राकट्योत्सव बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का विशेष पूजन किया जाता है।
इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, पद भार, विद्यारंभ, वाहन, भवन खरीदना आदि कार्य अतिशुभ और विशिष्ट
होते हैं।
इस दिन हर
कार्य सफल प्रत्येक कार्य का संचालन बुद्धि, विवेक और ज्ञान के आधार पर ही होता है इसलिए विद्या-बुद्धि की अधिष्ठात्री
देवी मां सरस्वती के जन्मदिवस से किसी भी कार्य का शुभारंभ किया जाए तो वह कार्य
सफल होगा।
ग्रीष्म और
शीत का संधिकाल संवत्सर चक्र का परिवर्तन बसंत पंचमी पर्व का मुख्य ध्येय है। यह
ग्रीष्म और शीत का संधिकाल है। हमारी सारस्वत शक्तियों के पुनर्जागरण के लिए इस
पर्व का विशेष महत्त्व है। सृष्टि का संयोग इसी दिन से प्रारंभ होता है।
इसलिए इस दिन
देवी सरस्वती और भगवान कृष्ण के साथ कामदेव व रति की पूजा की भी परंपरा है। इस
माह को मधुमास भी कहा जाता है। सरस्वती को बुद्धि और ज्ञान के साथ ही संगीत व
कला की देवी भी माना जाता है।
प्रकृति के
चितेरों, साहित्य
मनीषियों और कवियों ने इस दिन को अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया है।
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational
story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है:facingverity@gmail.com.पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और
फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!
Source – KalpatruExpress News Papper
|
अभी तो आया है मेरे जीवन में मृदुल बसंत!
सरस्वती वंदना
सूर्यकांत
त्रिपाठी निराला वर दे, वीणावादिनि वर
दे ! प्रिय स्वतं}-रव अमृत मं} नव भारत में भर दे ! काट अंध-उर के बंधन
स्तर बहा जननि, ज्योतिर्मय
निर्झर; क¶ुष-भेद-तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे ! नव
गति, नव ¶य, ता¶-छंद नव नव¶ कंठ, नव ज¶द-मन्द्र रव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे !
शैलेन्द्र
चौहान सूर्यकांत त्रिपाठी निराला छायावाद युगीन हिन्दी कविता के चार प्रमुख
स्तंभों में से एक माने जाते हैं। यूं उस समय के सभी प्रसिद्ध कवि, लेखक निराला के घर पर वसंतपंचमी के दिन आ
जुटते थे और वसंतोत्सव का सृजनात्मक स्वागत करते थे, भांग छानते और अपनी कविताएं सुनाते थे।
निराला वसंतोत्सव से आनंदविभोर हो जाते थे। इसी कारण इस दिन को उनके जन्मदिन से
जोड़कर देखा जाने लगा। वसंत पर उनकी अनेक सुन्दर कविताएं हैं यथा - अभी न होगा
मेरा अंत/ अभी अभी तो आया है/ मेरे जीवन में मृदुल वसंत। या - सखी यह डाल वसन
वासंती लेगी आदि।
निराला की
काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता है चित्रण-कौशल।
आंतरिक भाव हो
या बाह्य जगत के दृश्य-रूप, संगीतात्मक ध्वनियां हों या रंग और गंध, सजीव चरित्र हों या प्राकृतिक दृश्य, सभी अलग-अलग लगने वाले तत्वों को घुला-मिलाकर निराला ऐसा जीवंत चित्र
उपस्थित करते हैं कि पढ़ने वाला उन चित्रों के माध्यम से ही निराला के मर्म तक
पहुंच जाता है। निराला के चित्रों में उनका भावबोध ही नहीं, उनका चिंतन भी समाहित रहता है। इसलिए उनकी
बहुत-सी कविताओं में दार्शनिक गहराई उत्पन्न हो जाती है। वे हिन्दी में मुक्तछंद
के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। यद्यपि निराला के काव्य में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, रहस्यवाद और जीवन के गूढ़ पक्षों की जीवन-विमुख प्रवृत्तियों की झलक मिलती
है पर लोकमान्यताओं के आधार पर निराला ने विषयवस्तु में नये मान स्थापित किये और
समसामयिकता के पुट को भी खूब उभारा। वे खड़ी बोली के कवि थे, पर ब्रजभाषा व अवधी भाषा में भी कविताएं
गढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के
प्रति सहानुभूति व संवेदना, कहीं देश-प्रेम का जज्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध, यथार्थ की पक्षधरता व प्रकृति के प्रति
झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी समाज
के शोषित यथार्थ का एक स्पष्ट आइना है।
सौ पदों में
लिखी गयी तुलसीदास निराला की सबसे बड़ी कविता है, जो कि 1934 में लिखी गयी
और 1935 में सुधा के
पांच अंकों में किश्तवार प्रकाशित हुयी। इस प्रबन्ध काव्य में निराला ने पत्नी
के युवा तन-मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को दिखाया है -
जागा जागा संस्कार प्रबल/ रे गया काम तत्क्षण वह जल/ देखा वामा, वह न थी, अनल प्रमिता वह/ इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान/ हो गया भस्म वह प्रथम भान/ छूटा जग का जो रहा ध्यान। सन 1916 ई. में निराला
की अत्यधिक
प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचना जूही की कली लिखी गयी। यह उनकी प्राप्त रचनाओं में
पहली रचना है। यह उस कवि की रचना है, जिसने सरस्वती और मर्यादा की फाइलों से हिन्दी सीखी, उन पत्रिकाओं के एक-एक वाक्य को संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी व्याकरण के सहारे
समझने का प्रयास किया। उस समय वे महिषादल में थे। रवीन्द्र कविता कानन के लिखने
का समय यही है। सन 1916 में ही इनका
हिन्दी-बांग्ला का तुलनात्मक व्याकरण सरस्वती में प्रकाशित हुआ।
जूही की कली
कविता में निराला ने अपनी अभिव्यक्ति को छंदों की सीमा से परे छन्दविहीन कविता
की ओर प्रवाहित किया है। निराला छंदमुक्त कविता के प्रथम पक्षधर थे। उनके काव्य
में लयात्मकता का प्रभाव सदैव कायम रहा। जिन दिनों निराला इलाहाबाद में थे। इलाहाबाद
विश्वविद्यालय के यशस्वी वाइस चांसलर अमरनाथ झ भी वहीं थे। शिक्षा, संस्कृति और प्रशासकीय सेवाओं के क्षेत्र
में अमरनाथ झ का डंका बजता था। उनका दरबार संस्कृतिकर्मियों से भरा रहता था।
अमरनाथ झ ने निराला को पत्र लिखकर अपने घर पर काव्य पाठ के लिए निमंत्रित किया।
पत्र अंग्रेजी में था। निराला ने उस पत्र का उत्तर अपनी अंग्रेजी में देते हुए
लिखा- ‘आई एम रिच ऑफ
माई पुअर इंग्लिश, आई वाज ऑनर्ड
बाई योर इनविटेशन टू रिसाइट माई पोयम्स एट योर हाउस।
हाउ एवर मोर
आनर्ड आई विल फील इफ यू कम टू माई हाउस टू लिसिन माई पोयम्स।’ निराला तो कहीं भी, किसी को भी कविता सुना सकते थे लेकिन वे
वाइस चांसलर और अपने घर पर दरबार लगाने वाले साहित्य संरक्षक के यहां जाकर अपनी
कविताएं नहीं सुनाते थे। यही शब्द का सम्मान और साहित्य की साधना का यथार्थ रूप
था। निराला जैसे कवि के व्यक्तित्व को हम आज के परिदृश्य में कैसे देखें। पहली
बात तो मन में यही आती है कि राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद कितनी तेजी
से हम सांस्कृतिक दृष्टि से पराधीन हो गए हैं। एक ओर देश के प्राय: सभी मंचों पर
अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी अपसंस्कृति का कब्जा बढ़ता जा रहा है और उससे भी
यातनाप्रद स्थिति यह है कि हम उससे उबरने का साहस नहीं कर रहे हैं। हिंदी
साहित्य में ऐसे विद्रोही कवियों की परंपरा है जिसके आदर्श कबीर, जायसी, तुलसी, मीरा और
सूरदास हैं। रीतिकालीन कवियों में भी अनेक ने यह जोखिम उठाया है। निराला की ही
परंपरा में मुक्तिबोध, नागाजरुन, शील, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और
शमशेर ने इसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाया और यह एक समृद्ध परम्परा के रूप में
विकसित होती गयी। दुर्भाग्य से आज पूंजीवाद, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उत्तर आधुनिकता के तहत उपभोक्तावाद के प्रभाव में
वर्तमान कवि इस परंपरा से विमुख होते गए हैं और इसी कारण कविता की स्वीकार्यता
कम से कमतर होती गयी।
उनकी रचनाओं
में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति।
|
||
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के
साथ E-mail करें. हमारी Id है:facingverity@gmail.com.पसंद आने पर
हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!
Source – KalpatruExpress News Papper
‘गांवों ने फाग गा के कहा आ गया बसंत’
डॉ. प्रेम
शंकर सिंह यूं तो बसंतपंचमी को हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सरस्वती पूजा
के रूप में मनाया जाता है किन्तु सुहाग, श्रृंगार, प्रेम और नवता
के प्रतीक के रूप में इसको मनाने की परम्परा भी कम पुरानी नहीं है। साम्प्रदायिक
सौहाद्र्र के लगातार क्षरित होते जा रहे समय में यह अकेला पर्व है जिसे
हिन्दू-मुसलमान दोनों बराबर उत्साह से मनाते हैं।
संयोग से 12वीं सदी के आसपास इसकी शुरुआत पश्चिमी
उत्तरप्रदेश और दिल्ली के मध्य हुई। खड़ी बो¶ी हिन्दी के प्रथम कवि अमीर खुसरो ख्वाजा निजामुद्दीन औ¶िया के मुरीद थे, जिनकी परवरिश उत्तरप्रदेश के एटा जि¶े में हुई थी। कहा जाता है कि दिल्ली के
प्रसिद्द सूफी संत निजामुद्दीन औ¶िया के भतीजे तकीऊद्दीन नूह की मृत्यु बहुत कम उम्र में हो गयी थी, जिसके कारण वे दुखी रहने ¶गे थे। ऐसा देख उनके अनुयायी अमीर खुसरो
अपने पीर के ग़म को दूर करने के उपाय त¶ाशने ¶गे। एक दिन
खुसरो ने श्रृंगार करके, हाथमें सरसों
का फू¶ ¶िए गीत गाती
हुई कुछ औरतों को देखा। खुसरो ने उनसे वज़ह पूछी तो उन्होंने बताया कि आज बसंत
पंचमी है और वो अपने भगवान को चढ़ावा चढ़ाने जा रहीं हैं। खुसरो ने भी अपने
देवता निजामुद्दीन को खुश करने की सोची। जल्द ही वो उन औरतों की तरह श्रृंगार कर
अपने हाथों में सरसों के कुछ फू¶ ¶ेकर गाना गाते हुए निजामुद्दीन के दर्शन को निक¶ पड़े। स्}ी रूप धरे खुसरो को देखकर औ¶िया मुसकुरा पड़े। तबसे बसंत के अवसर पर यह गीत च¶ पड़ा जिसे आज भी सुना जा सकता है- सकल बन
फूल रही सरसों,/अमवा बौरे, टेसू फूले।/ कोयल बोले डार डार, औ गोरी करत सिंगार।
मलिनियां गरवा
ले आयी करसों/ सकल बन फूल रही सरसों।
इस तरह
सूफियों में भी बसंत को मनाने की परम्परा चल पड़ी। बसंत और होली को आधार बनाकर
कई गीत खुसरो ने लिखे। बसंत और होली परस्पर पूरक पर्व भी हैं। शायद यही कारण है
कि बसंत के ही दिनों में गाया जाने वाला राग बसंत शास्त्रीय संगीत की
हिंदुस्तानी पद्धति का राग है। बसंत ऋतु में गाये जाने के कारण इस राग में
होलियां बहुत मिलती हैं। यह प्रसन्नता तथा उत्फुल्लता का राग है। ऐसा माना जाता
है कि इसके गाने व सुनने से मन प्रसन्न हो जाता है। हिन्दी साहित्य में बसंत के
कारण दो कवि बहुत महत्त्व रखते हैं- एक हैं नजीर अकबराबादी और दूसरे निराला। समय
के लिहाज से दोनों का काल अलग है। किन्तु समय को पार कर दोनों की समानता को
देखना हो तो कहा जा सकता है कि एक आधुनिक हिन्दी कविता का पहला कवि है और दूसरा
हिन्दी कविता का महाप्राण है। सत्रहवीं शताब्दी में बसंत को नजीर अकबराबादी के
रूप में बड़ा रचनाकार मिला।
नजीर
अकबराबादी के जीवन और कविता पर आधारित केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के सहयोग से कवि देवी प्रसाद मिश्र
द्वारा निर्मित एक वृत्तचित्र में उचित ही उन्हें हिन्दी के पहले युद्ध विरोधी
और धूल-मिट्टी के कवि के रूप में याद किया गया है। युद्ध की भयावहता से परेशान
हो दिल्ली छोड़कर आगरा आ बसे नजीर ने बसंत को पुकारा।
आम जन की भाषा
में दरबारी संस्कारों का अतिक्रमण करती नजीर की कविता में जनजीवन के संघर्ष और
ताप को सुना जा सकता है।
यह हिन्दी का
दुर्भाग्य है कि औपनिवेशिक साजिश का शिकार हो हमने हिन्दी और उर्दू को दो भाषा
मान लिया और नजीर जैसे हिन्दी की जातीय परम्परा के कवि को उर्दू की परम्परा में
धकेल दिया। हिन्दी कविता के महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के बारे में यह
कहा जाता है कि सही जन्मतिथि ज्ञात न होने के कारण वह बसंत पंचमी को ही अपना
जन्मदिन मनाते थे। निराला को बसंत तो प्रिय था ही, नजीर भी कम प्रिय न थे। अपने दो निबंधों ‘साहित्य की समतल भूमि’ तथा ‘मुसलमान और
हिन्दू कवियों में विचार साम्य’, में निराला ने नजीर को बहुत सम्मान से याद किया है।
नजीर की कविता
में उनके भेद मूलक समाज के प्रतिकार का कुछ स्वर इस तरह सुनाई पड़ता है-कुछ
जुल्म नहीं कुछ जोर नहीं/ कुछ दाद नहीं फरियाद नहीं/ शागिर्द नहीं उस्ताद नहीं/
वीरान नहीं आबाद नहीं/ है जितनी बातें दुनिया की सब भूल गए कुछ याद नहीं/ हर आन
हंसी हर आन खुशी/ हर वक्त अमीरी है बाबा/ जब आशिक मस्त फकीर हुए फिर क्या
दिलगीरी है बाबा।
नजीर की कविता
में यह ताकत आम आदमी की उपस्थिति के कारण है। नजीर ने उसके सुखदु: ख दोनों को
बराबर पहचानते हुए ही लिखा होगा कि-या आदमी ही कहर से लड़ते हैं घूर-घूर/ उर
आदमी ही देख उन्हें भागते हैं दूर-दूर/ चाकर गुलाम आदमी और आदमी मजूर/ यां तक कि
आदमी ही उठाते हैं जा जरूर।
नजीर की तरह
ही निराला भी मनुष्यता के लिए एक ऐसा समाज चाहते थे जहां मनुष्य, मनुष्य के दु:ख का कारण न रहे। ऐसा आधुनिक
समाज ही उनकी कविता में साकार होता है जहां प्रेम, श्रृंगार, उल्लास, सुख पर किसी तरह का बंधन न रहे और हर तरफ
नवता का उल्लास हो।
ज्ञान की देवी
सरस्वती से उनकी प्रार्थना है कि- काट अंध उर के बंधन-स्तर/ बहा जननी ज्योतिर्मय
निर्झर/ कलुष भेद तम हर प्रकाश भर/ जगमग जग कर दे! नव गति, नव लय, ताल छंद नव, नवल, कंठ, नव जल्द-मंद्र रव/ नव नभ के नव विहग वृन्द को/ नव पर नव स्वर दे।
कुंठा और
स्वार्थपरता समाज के स्वस्थ विकास में बाधा है।
मनुष्य के
जीवन में वास्तविक उल्लास बिना इनको नष्ट किए नहीं आ सकता। वसंत प्रकृति के नए
श्रृंगार का प्रतीक बनकर उनकी कविता में बार-2 आता है- भरा हर्ष वन के मन नवोत्कर्ष छाया सखि, वसंत आया! किसलय-वसना नव-वय-लतिका मली मधुर
प्रिय उर तरु- पतिका,मधुप-वृंद
बंदी पक-स्वर नभ सरसाया सखि, वसंत आया! लता-मुकुल हार गंध-भार भर, बही पवन बंद मंद मंदतर जागी नयनों में वन-यौवन की माया सखि, वसंत आया! कुंठाहीन मन ही श्रृंगार के
स्वागत की ऐसी तैयारी कर सकता है, जिसमें प्रकृति और जीवन एक ही रंग में रंग जाए। रंगों के त्योहार होली का
संबंध बसंत के साथ इसीलिए जोड़ा जाता है। जीवन में हर तरह की संकीर्णता का विरोधी
कवि ही कुंठाहीन मन से रंगों से युक्त श्रृंृंगार के ऐसे चित्र अपनी कविता में
खींच सकता है- नयनों के डोरे लाल गुलाल भरे, खेली होली! जागी रात सेज प्रिय पति-संग सनेह-रंग घोली,/ दीपित दीप-प्रकाश, कंज-छवि मंजु-मंजु हंस खोली-/ माली मुख-
चुम्बन रोली। / प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गयी चोली, एक-वसन रह गयी मंद हंस अधर-दशन अनबोली-/
कली-सी कांटे की तोली।
कहना चाहिए कि
बसंत भारतीय संस्कृति की साङी संस्कृति का प्रतीक पर्व है, प्रेम, श्रृंगार और उल्लास का भी। आज जब जीवन के हर क्षेत्र में किसी नई चीज के लिए
अंतहीन इंतजार करना पड़ता है, तब बसंत जैसा त्योहार इस बात का भी प्रतीक बन जाता है कि समाज में घटने वाले
किसी नए परिवर्तन के स्वागत की तैयारी भी हमारा कम महत्त्वपूर्ण कार्यभार नहीं
है। तो आइये कवि त्रिलोचन की इन पंक्तियों के साथ बसंत का स्वागत करें- कोकिल ने
गान गा के कहा आ गया बसंत/ आमों ने बौर ला के कहा-आ गया बसंत/ क्यों मुझको
छेड़ती है हवा बोल बार-बार/ उसने जरा बल खाके कहा आ गया वसंत । / चौताल की लहर
में बोल ढोल के उठे/ गावों ने फाग गा के कहा- आ गया वसंत।
‘गांवों ने फाग
गा के कहा आ गया बसंत’ सूर्यकांत
त्रिपाठी निराला नजीर अकबराबादी
|
||
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के
साथ E-mail करें. हमारी Id है:facingverity@gmail.com.पसंद आने पर
हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!
Source – KalpatruExpress News Papper
सदस्यता लें
संदेश (Atom)



