मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

विज्ञान प्रश्नोत्तरी-



प्रश्न: आपके आस-पास बैठे व्यक्तियों में कुछ व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा अधिक आकर्षक और दैदीप्यमान चेहरे के क्यों दिखाई देते हैं, इसका वैज्ञानिक कारण बताइये।

उत्तर: यह रोचक प्रश्न है और निश्चित ही वैज्ञानिक कारणों से भरा है। यह सभी ने देखा और महसूस किया होगा कि हम सभी के साथ कभी न कभी यह घटना घटी होगी या होती रहती है। यह आभामंडल से सम्बंधित बात है।
आभामंडल ऊर्जा की अदृश्य तरंगें होती हैं, जो किसी भी व्यक्ति के शरीर के विभिन्न अंगों से छनकर निकलती रहती हैं और संभवत: हर व्यक्ति के शरीर से ये तरंगें निकलती हैं, किसी से कम तो किसी से अधिक। इन तरंगों को खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता है। मात्र इनका अनुभव ही किया जा सकता है, ये ऊर्जा तरंगें जितनी शुद्ध होंगी उतनी ही क्षमतावान और तीव्रतावान होंगी और जिस व्यक्ति से ऐसी तीव्रता और क्षमता की तरंगें निकलती हैं वह उतना ही आकर्षक और मजबूत दिखाई देता है। बड़े प्रबुद्ध महापुरुष के चेहरों के आभामंडल ही उन्हें आकर्षक और क्षमतावान जीवंत दिखाते थे जो सामान्य लोगों की आंखों से कभी नहीं मिट पाते। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ फोटोजिओ माफरेलॉजिस्ट्स में शोध करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति के प्रभामंडल की तरंगें खुली आंखों से नहीं देखी जा सकती हैं, परन्तु उसके शरीर के चेहरे और सिर से निकलने वाली ऊर्जा तरंगों को अनुषंगी कैमरे के माध्यम से देखना संभव है। इस बैंड की तरंगें दृश्य सीमा में नहीं होती हैं। परन्तु अत्याधुनिक कैमरे जो उपग्रह कैमरे कहलाते हैं वे पराबैंगनी से लेकर इन्फ्रारेड सभी प्रकार की तरंगों को पकड़ पाने और उनकी तस्वीर दिखाने में सक्षम हैं। शरीर से निकलने वाली अदृश्य किरणों का विेषण अब इन उपग्रह कैमरों से पूरी तरह संभव है। ये कैमरे यह भी बताने में सक्षम होते हैं कि किसी घर में कितने लोग हैं।
अंतरिक्ष में अब ऐसे उपग्रह भी भ्रमण करने लगे हैं जो व्यक्ति के शरीर पर बन रहे प्रभामंडल को पहचान लेते हैं। इन उपग्रहों की सहायता से अब उन व्यक्तियों के विषय में भी समझ पाना आसान होगा जो तहखाने में भी छिपे होंगे। इसके लिए एक आवश्यक शर्त यह होगी कि उस व्यक्ति के प्रभामंडल के स्पेक्ट्रम का अंकीय रूप(डिजिटल) सुरक्षित हो। शरीर के कुछ अंग ऐसे होते हैं जिनके सभी ओर प्रभामंडल सघन रूप से व्याप्त होता है जैसे आंखें, चेहरा, हाथ पैर की उंगलियों की पोर तथा शिखा। इन अंगों में प्रभामंडल तीव्रता से फैलता है। यह उपग्रहीय कैमरे से ज्ञात होता है परन्तु मनुष्यों के द्वारा यह यूं ही बताया जा सकता है कि कौन व्यक्ति कितना आकर्षक है।

प्रश्न: तम्बाकू के विषय में शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से भ्रम व्याप्त हैं जो उन्हें तम्बाकू जनित तमाम बीमारियों की चपेट में लगातार समेटते जा रहे हैं। तम्बाकू और मनुष्य के शरीर की क्रियाविधि का वैज्ञानिक सम्बन्ध आपको कहां तक ज्ञात है

उत्तर: विश्व में तम्बाकू की सर्वाधिक खपत धूम्रपान में होती है विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यदि भारत में बीड़ी और सिगरेट का प्रयोग करने वालों की संख्या को पूरी दुनिया के साथ जोड़ा जाये तो लगभग 8-9 खरब सिगरेट प्रतिवर्ष जला दी जाती है। पूरे विश्व में सभी माध्यमों से धूम्रपान करने वालों की संख्या 13 करोड़ से ऊपर जा चुकी है और इसमें महिलाएं और किशोर भी सम्मिलित हैं। भारत में तम्बाकू का प्रयोग पान, सुर्ती, खैनी, गुटखा के रूप में व्यापक पैमाने पर होता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके घातक और नशीली वनस्पतियों का प्रचार प्रसार बड़े जोर शोर से करती हुयी दिखाई देती हैं। बीड़ी, फिल्टर लगी सिगरेट, आकर्षक पाउच में आने वाले गुटखे, तम्बाकू इत्यादि नशीली वस्तुएं आकर्षक पैकेट में लोगों को मोहित करके उनमें रोगों का बसेरा करती हैं। सिगरेट को आज शहरी समाज और परंपरागत ग्रामीण समाज में प्रतिष्ठा का पर्याय बनाकर सामान्य जन को रोग उपहार में बांटा जा रहा है या रोगों को लोग पैसों से खरीद रहे हैं। एक तम्बाकू के पौधे में निकोटीन नाम का एल्कलाइड भारी मात्रा में उपस्थित होता है। एल्कलाइड अत्यंत त्वरित प्रभाव डालने वाला घातक विष होता है जिसकी कुछ बूंदें घोड़े जैसे सशक्त पशु और एक से दो बूंद कुत्ते जैसे वफादार जानवर की मृत्यु के लिए पर्याप्त होती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य दिन और रात को मिलाकर तम्बाकू से बने हुए जितने पदार्थो को ग्रहण करता है उतना यदि एक बार में ही ले ले, तो उसकी मृत्यु तुरंत संभव है। यह एल्कलाइड गर्भवती स्त्री के गर्भाशय का रक्त प्रवाह मंद कर देता है जिससे गर्भस्थ शिशु में आक्सीजन और अन्य पदार्थो की प्राप्ति में बाधा पड़ती है। इससे इन शिशुओं का भार अपेक्षाकृत 200 ग्राम कम होता है। मानसिक रूप से ऐसे बच्चे विकलांग भी होते हैं। निकोटीन के अलावा तम्बाकू में पाइकोसीन, पिरिडीन, श्नोजेन, अमोनिया परकोरेल, यूरिक एसिड, काबरेनिक अम्ल, कोलिडीन, कार्बन मोनोक्साइड एजोसिन जैसे विषाक्त तत्व भी पाए जाते हैं। निकोटीन तो इतना भयावह तत्व है कि यदि 1 औंस के 1/400 वें भाग को भी मनुष्य के रक्त में इंजेक्शन के माध्यम से पहुंचा दिया गया तो व्यक्ति मर जाएगा। पिरीडीन आंतों में खुश्की पैदा करता है जिससे पेट में कब्ज रहती है और इसके कारण व्यक्ति हार्निया, बवासीर, फिश्चुला और गुदा कैंसर से पीड़ित हो जाता है और इसके कारण भीतरी अंगों में कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। वर्तमान समय में पान मसालों के साथ गुटखे का प्रयोग बहुत बढ़ गया है,मुख की नाजुक त्वचा के साथ इनका संपर्क होते ही इनसे लार ग्रंथियों में दोष उत्पन्न हो जाता है,और लार ग्रंथियां लार का स्नव धीरे धीरे कम कर देती हैं जिससे मुख सूखा रहने लगता है, कुछ समय बाद मुख की निचली त्वचा भी सूखने लगती है और म्यूकस फाइब्रोसिस नाम की बीमारी हो जाती है जो बाद में मुंह के कैंसर का रूप धारण कर लेती है।
किशोरों और छोटे बालक जो बहुत कम उम्र में गुटखे का सेवन करने लगते हैं, उनमें जीभ के कैंसर की भी संभावना रहती है और ऐसे लोगों की जीभ काट दी जाती है। इस सन्दर्भ में मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट के चिकित्सकों का कहना है कि तम्बाकू और सुपारी चबाने वालों के मुंह और गले के कैंसर की संभावना के साथ-साथ जीभ के कैंसर की संभावना अधिक रहती है। आज अधिक कमाने की चाहत में कम्पनियां जर्दे इत्यादि में प्रतिबंधित पदार्थो को मिला देती हैं जैसे कत्थे में गैम्बियर का प्रयोग जो पेंटिंग के काम में लाया जाता है, इससे मुख से सम्बंधित तमाम रोगों की संभावना बढ़ जाती है।
देश के चर्चित होम्योपैथ डॉ. सोमनाथ मुखर्जी के अनुसार लोगों को यह भ्रम होता है कि तम्बाकू का सेवन करने से ही वे शौच क्रिया को संपन्न कर सकते हैं।
जबकि इसका उल्टा ही होता है, वे कब्ज के शिकार हो चुके होते हैं।
वैज्ञानिकों का मत है कि लोगों में यह भी भ्रम है कि यदि फिल्टर वाली सिगरेट का सेवन किया जाये या कम तारकोल वाली सिगरेट का प्रयोग किया जाये तो खतरा कम हो जाता है जबकि ये नुस्खे मात्र झूठे और प्रसार को बढ़ाने वाले होते हैं। इससे लोग ज्यादा गहरा कश लेते हैं और तम्बाकू के घातक पदार्थ उनमें अधिक भीतर तक प्रविष्ट करके फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और स्वर यंत्र, ग्रसनी भोजन नलिका के कैंसर पैदा करने लगते हैं। सिगार और पाइप पीने वालों में भी यह खतरा उतना ही बना रहता है। पाइप पीने वालों में हृदय रोग का एक अतिरिक्त खतरा और बढ़ जाता है। धूम्रपान करने वालों पर लगाम लगाने वाले लोगों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर यह कानून बना दिया गया है कि कोई भी सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान न करे क्योंकि इससे अन्य उन लोगों पर भी खतरा मंडराने लगता है, जो इस धुएं से बेवजह रोग की चपेट में आ जाते हैं।
अभी पर्यप्त जागरूकता की जरूरत है जिससे इस समस्या से निजात पाया जा सके।
प्रस्तुति- वंदिता मिश्रा
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Source – KalpatruExpress News Papper





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